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शूरसैनी रासो (सैनियों का इतिहास)

शूरसैनी रासो

(धर्मपालसुत कृत)

 अथ मंगलाचरणम

जय महाराजा शूरसेन!

जय शूरसैनी बलदेव जी महाराज!

जय शूरसैनी कृष्ण जी महाराज!

जय अमर बलिदानी दाता शेर सिंह सैनी सलारिआ!

जय सती माई बुआ दाती!

जय सती माई बीबी गुरदित्ती!

जय  अमर बलिदानी माता बीबी शरण कौर पाब्ला!

जय अत्रि कुल!

जय वृष्णि संघ!

जय यदु वंश!

मंगलाचरणम समाप्त।

पकड़ तुरक गन कउ करें वै निरोधा!

सकल जगत में खालसा पंथ गाजै!

जगै धर्म हिन्दुक , तुर्क दुंद भाजै!

उग्रदंति ।   

श्री भगौती जी सहाय! 

श्री मुखवाक पातशाही दसवीं!

 

 

अब सैनियों का इतिहास संक्षिप्त में

"हमने पोरस नामक राजा उत्पन्न करने का श्रेय पंजाब के यादवों को दिया है।  (प्रयाग से) पुरु चन्द्रवंशिओं की इस शाखा का उपनाम बन गया ।  इसे सिकंदर के इतिहासकारों ने पोरस कहा।  शूरसेन के वंशज , मथुरा के शूरसैनीसभी पुरु ही थे यानी मेगेस्थेनेस के "प्रासिओई” । "

(एनल्स एंड एंटीक्विटिस ऑफ़ राजपुताना , कर्नल जेम्स टॉड, पृष्ठ 36 , 1873 )

“सैनी अपने उद्गम का अनुरेखण उस राजपूत शाखा से करते हैं  जो सबसे पहले हुए मुस्लमान आक्रमणों से  हिन्दुओं की रक्षा करने के लिए यमुना के तट पर  दिल्ली के दक्षिण में मथुरा के निकट अपने ठिकाने से आये। "

(दी लैंड ऑफ़ फाइव रिवर्स ; पंजाब का एक आर्थिक इतिहास --- पृष्ठ 100 , हुग कैनेडी ट्रेवस्किस , ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1928)

" शौरसैनी शाखावाले मथुरा उसके आस पास के प्रदेशों में राज्य करते रहे।  करौली के यदुवंशी राजा शौरसैनी कहे जाते हैं।  समय के फेर से मथुरा छूटी और सं. 1052  में बयाने के पास बनी पहाड़ी पर जा बसे।  राजा विजयपाल के पुत्र तहनपाल (त्रिभुवनपाल) ने तहनगढ़ का किला बनवाया।  तहनपाल के पुत्र (द्वितीय) और हरिपाल थे जिनका समय सं 1227 का है।  "

- नयनसी री ख्यातदूगड़ (भाषांतकार ), पृष्ठ 302

अर्जुन द्वारा यदुवंशियों को पंजाब में बसाने का प्रसंग विष्णु पुराण में आता है श्री कृष्ण के पड़पौत्र वज्रनाभ को शक्रप्रस्थ अर्थात् इंद्रप्रस्थ (या वर्तमान दिल्ली)  का राजा बनाने का प्रसंग महाभारत के मौसल पर्व  में आता है। इनके वंशजों ने अफगानिस्तान तक का इलाका जीत लिया था अल-मसुदी, अदबुल-मुलुक और फरिश्ता जैसे अरबी और तुर्क इतिहासकारों ने भी अफगानिस्तान और पंजाब के काबुलशाही (हिंदू शाही) राजाओं को यदुवंशी  या शूरसैनी  बताया है। कश्मीर के इतिहास राजतरंगनी के रचयिता कल्हण का भी यही मत है कि काबुल शाही राजा क्षत्रिय थे गज़नी शहर सैनी-यदुवंशी अर्थात शूरसैनी राजा गज महाराज ने बसाया था इतिहासकार राजा पोरस को भी शूरसैनी यादव (अर्थात सैनी ) मानते हैं मेगेस्थेनेस जब भारत आया तो उसने मथुरा के राज्य का स्वामित्व शूरसैनियों के पास बताया। उसने सैनियों के पूर्वजों को यूनानी  भाषा में "सोरसिनोई " के नाम से सम्भोदित किया यह उसका लिखा हुआ ग्रन्थ "इंडिका" प्रमाणित करता है जो आज भी उपलभ्ध है।

बाद में मथुरा पर मौर्यों का राज हो गया उसके पश्चात कुषाणों और शूद्र राजाओं ने भी यहाँ पर राज किया। कहा जाता है की लगभग आठवीं शताब्दी के आस पास पंजाब और सिंध वाले क्षेत्र से (जहां भाटी शूरसैनियों  का वर्चस्व था ) कुछ यदुवंशी मथुरा वापिस गए और उन्हों ने यह इलाका पुनः जीत लिया। इन राजाओं की वंशावली राजा धर्मपाल से शुरू होती है जो कि श्री कृष्ण की 77वीं पीढ़ी के वंशज बताये जाते हैं यह यदुवंशी राजा सैनी (या शूरसैनी) कहलाते थे यह कमान (कादम्ब वन ) का  चौंसठ खम्बा शिलालेख इंगित करता है और इसको कोई भी  प्रमाणित इतिहासकार चुनौती नहीं दे सकता वर्तमान काल में करौली का राजघराना इन्ही सैनी राजाओं का वंशज है

10वीं और 11वीं शताब्दियों में भारत पर गज़नी के मुसलमानो के आक्रमण शुरू हो गए और लाहौर की काबुल शाही राजा ने भारत के अन्य राजपूतों से सहायता मांगी इसी दौरान मथुरा , भटनेरलौद्रवा (जैसलमेर), और दिल्ली के  शूरसैनी राजाओं ने राजपूत लश्कर पंजाब में किलेबन्दी और काबुलशाहियों की सहायता के लिए भेजे इन्होने पंजाब में बहुत बड़ा इलाका तुर्क मुसलमानो से दुबारा जीत लिया और जालंधर में राज्य बनाया जिसकी राजधानी धमेड़ी (वर्तमान नूरपुर) थी। धमेड़ी के नाम का कृष्णवंशी राजा धर्मपाल के नाम से सम्बन्ध पूर्ण रूप से इंगित है और सैनी और पठानिआ राजपूतों की धमड़ैत खाप का सम्बन्ध इन दोनों से है धमेड़ी का किला अभी भी मौजूद है और यहाँ पर तोमर-जादों-भाटी  राजपूतों का  तुर्क मुसलमानो के साथ घमासान युद्ध हुआ तोमर-जादों राजपूतों और गज़नी के मुसलमानो का युद्ध क्षेत्र लाहौर और जालंधर (जिसमे वर्तमान हिमाचल भी आता  है) से मथुरा और लौद्रवा (जैसलमेर) तक फैला हुआ था यह युद्ध लगभग 200 साल तक चले और इस काल में दोनों पक्षों की जय पराजय अनेकानेक बार हुई

इस काल में मथुरा , बयाना, थानगिरि, भटनेर, पूगल, लौद्रवा (जैसलमेर), और दिल्ली से तोमर-जादों-भाटी  राजपूतों का पलायन युद्ध के लिए या युद्ध के प्रवभाव से पंजाब की ओर होता रहा ।तोमर, भाटी, और जादों राजपूतों की खापें एक दूसरे में घी और खिचड़ी की तरह समाहित हैं और बहुत से इतिहासकार इनको एक ही मूल का मानते हैं (उदाहरण: टॉड और कन्निंघम) इन राज वंशों के पूर्व मधयकालीन संस्थापक दिल्ली के राजा अनंगपाल और मथुरा के राजा धर्मपाल थे पंजाब, जम्मू और उत्तरी पश्चमी हरयाणा के नीम पहाड़ी क्षेत्रों के सैनी इन्ही तोमर, जादों और भाटी राजपूतों के वंशज हैं जो सामूहिक रूप से शूरसैनी या सैनी कहलाते थे। पहाड़ों पर बसने वाले डोगरा राजपूतों में भी इनकी कई  खापें मिली हुई हैं स्मरण रहे कि भाटी शूरसैनियों और उनके पूर्वजों का बाहुल्य और बाहुबल का ठिकाना चिरकाल से पंजाब  में ही था।   इस लिए पंजाब में शूरसैनी यदुवंशी इस सैनिक पलायन से पहले भी थे और मथुरा, करौली और बयाना वाली शूरसैनी शाखा भी आठवीं शताब्दी में पंजाब से ही वहां गयी थी। ।  जैसलमेर के भाटी भी पंजाब से निकली हुई मात्र एक शाखा हैं। 

 जैसे कि पहले भी इंगित  किया गया है पंजाब और अफ़ग़ानिस्तान पर शासन करने वाले और मेहमूद ग़ज़नी की तुर्क मुस्लमान सेनाओं  से भिड़ने वाले काबुल शाही राजा भी भाटी शूरसैनी ही थे।  इनसे शुरू हुई शाखाएं आज भी पंजाब और जम्मू के सैनियों में  मिलती हैं। 

जब क्रूर मुस्लमान आक्रांता मोहम्मद शहाबुद्दीन घौरी अफ़ग़ानिस्तान लौट रहा था तो  उस मलेच्छ को मौत के घाट उतारने और उसे नर्क की आग में झोंकने वाले भी शूरसैनियों की  खोखर शाखा के योद्धा ही थे।  खोखर आज भी पंजाब और जम्मू के सैनी यदुवंशी क्षत्रियों की बहुत सी शाखाओं का उपगोत्र है। यह उपगोत्र अब पंजाब और पाकिस्तान कि अन्य जातियों में भी पाया जाता है लेकिन उन सब में भी  इस उपगोत्र का आगमन यदुवंशी सैनियों से ही हुआ है।  इस लिए हिन्दू हिरदय सम्राट पृथिवी राज चौहान जी  के वध के प्रतिशोध का  गौरव भी पंजाब के सैनी यादवों या शूरसैनियों को ही प्राप्त है।

शालिवाहन पंजाब के एक महाप्रतापी शूरसैनी राजा थे और भाटी शाखा इन्ही के वंशजों से उत्पन्न हुई है।  राजा शालिवाहन को शकों को पराजित कर अफ़ग़ानिस्तान तक का इलाका जीतने के लिए "शाकारि" कहा जाता हैं ।  भारत के शक सम्वत का उद्घोष शूरसैनी सेना के द्वारा शकों पर विजय प्राप्त करने  के दिवस से ही हुआ।  इस लिए भारतीय संस्कति को शूरसैनियों की देन ,मात्र युद्ध कौशल तक सीमित नहीं थी।  आधुनिक पंजाबी भाषा भी शूरसैनी भाषा का ही एक अपभ्रंश या  वंशधर है।  इस प्रकार से शूरसैनियों की छाप उत्तरी पश्चिमी भारत की संस्कृति के  हर आयाम पर है। 

खालसा पंथ कि उत्पति से पहले खैबर दर्रे के रखवाले औरहिन्द की चादर’ शूरसैनी अर्थात सैनी क्षत्रिय राजपूत ही थे। पंजाब , कश्मीर और पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में खालसा राज और हिन्दुपदपादशाही स्थापित करने वाले महाराजा रंजीत सिंह की वंशावली भी इन्ही शूरसैनियों में से निकलती है।


श्री कृष्ण सैनी थे : एक ऐतिहासिक तथ्य


इस ऐतिहासिक तथ्य का भी विस्मरण हो  कि  महाभारत में श्री कृष्ण और उनके कुटुम्भ के यादवों को, श्री कृष्ण के  दादा महाराजा शूरसेन के नाम के पीछे , "शूरसैनी" कह कर बार बार  सम्बोधित किया गया है।  श्री वेद व्यास जी  महाभारत में एक स्थान पर लिखते हैं :

"शूरसैनियों में सर्वश्रेष्ठ , शक्तिशाली, द्वारका में निवास करने वाले (श्री कृष्ण महाराज) सभी भू पतियों का दमन करेंगे और वह राजनीती शास्त्र में पूर्णतः निपुण होंगे "

(महाभारत , अनुशासन पर्व , 13-147 )

सद्गतिः , सत्कृति: , सत्ता , सद्भूतिः , सत्यपरायण:

शूरसेनो यदु श्रेष्ठः , सन्निवास:, सुयामुन:।। 

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् के 75वें श्लोक में श्री कृष्ण  को शूरसैनी इस प्रकार कहा गया है :

"जो सद्गति के रूप हैं , जो उत्तम क्रिया वाले हैं , जिनका अस्तित्व और सामर्थ्य स्वयम भू है , जो सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठा वाले हैं।

जो शूरसैनी यादवों में श्रेष्ठ हैं (अर्थात शूरसेन के कुल के शूरसैनी श्री कृष्ण) , जिनका निवास सत्पुरुषों का आश्रय है , और जो सुन्दर यमुना के तट पर विद्यमान हैं।। "

कुछ अल्पज्ञ टीकाकार , जिन्हे शास्त्र  और संस्कृत व्याकरण का पूरा ज्ञान नहीं है ,  यहाँ पर "शूरसेन" को "शूरवीर" अनुवादित करते हैं जो कि पूर्णतः त्रुटिपूर्ण है।  "शूरसेनः" का अभिप्राय  इस श्लोक में श्री कृष्ण के पारिवारिक नाम, जो  प्राकृत भाषा में "शूरसैनी" है, उसी से ही है क्योंकि यह शब्द महाभारत और पुराणों में केवल श्री कृष्ण के पितामह महाराजा शूरसेन और उनके कुटुम्भ के यादवों के लिए ही प्रयोग  होता है।  "शूरसेनो यदुश्रेष्ठः" का जहाँ भी प्रयोग होता है वह केवल और केवल श्री कृष्ण के लिए या उनके पितामह के लिए होता है जैसे कि भागवत की इस पंक्ति में "शूरसेनो यदुपतिः"  पितामह महाराजा शूरसेन के लिए प्रयोग किआ गया है ।

"शूरसेनो यदुपति: मधुरामावसन् पुरीम् "

(श्रीमद भगवत पुराण , स्कंध 10 , भाग 1 )

बहुवचन में "शूरसेनाः" का प्रयोग पौराणिक साहित्य में सदैव शूरसैनियों की सेना या जनपद के लिए होता है। 

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् के अनुवाद और व्याख्या उसके वृहत पौराणिक सन्दर्भ से पृथक करके नहीं किया जा सकते । यह शास्त्र व्याख्या का मौलिक नियम है।

इसलिए यह कहना भी अतिशोक्ति पूर्ण  नहीं होगा कि अगर श्री कृष्ण पृथ्वी पर फिर से आकर अपनी पहचान आधुनिक सन्दर्भ में दें तो उस पहचान में "सैनी" शब्द अनिवार्य रूप से  सम्मिलित होगा।

 

संपादकीय टिपण्णी :

प्रयाग यदुवंशिओं का प्राचीनतम उद्गम स्थल है।  शूरसैनी यादवों के प्राचीन इतिहास में प्रयाग, मथुरा और द्वारका सबसे पवित्र  देवभूमि  माने जाते हैं जिन्हे यदुवंश की सभी शाखाओं के लोग अत्यंत भक्तिभाव से देखते हैं।  टॉड ने प्रयाग को पुरु और पोरस का निरुक्त माना है लेकिन टॉड ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजा पोरस को शूरसैनी कहना केवल नाम की समानता पर आधारित नहीं है।  इसका कारण है कि विष्णु पुराण के अनुसार पंजाब द्वारका के बाद शूरसैनी यादवों  का मुख्य ठिकाना बन गया था।  रुचिकर बात यह भी है कि राजा पोरस के लगभग समकालीन वृष्णि संघ के सिक्के भी पंजाब के होशीआरपुर  में पाए गए जो कि आज भी  सैनी बाहुल्य क्षेत्र है। यह वृष्णि सिक्के पंजाब के बाहर आजतक कहीं और से नहीं मिले हैं।    वृष्णि यादवों की वो शाखा है जिस से श्री कृष्ण और उनके पितामह महाराजा शूरसेन थे।  वृष्णि और शूरसैनी एक ही थे ।

सभी शूरसैनी यादव होते हैं पर सभी यादव शूरसैनी नहीं क्योंकि प्राचीन यादवों में ५६ शाखाएं थीं।  शूरसैनी केवल वह यादव शाखा है जिसके मूल पुरुष श्री कृष्ण के पितामह महाराजा शूरसेन थे। यह यादवों की सबसे वर्चस्वी शाखा थी जिसमे श्री कृष्ण का जन्म हुआ था ।

जय दाते शेर सिंह सलारिये दी !

जय , शौरी ,  शूरसैनी, संकर्षण ,  नीलाम्बर, हलधर, हलयुद्ध, बलदेव, बलभद्र, श्री बलराम जी!

जय अच्युत,  शौरी ,  शूरसैनी,   सनातनसारथी ,  पार्थसारथी,  पीताम्बर,  पांडुरंगा,  श्री कृष्ण मुरारी जी!

वाहेगुरु जी का खालसा , वाहेगुरु जी की फ़तेह!


इति  धर्मपालसुत कृत: शूरसैनी रासो  समाप्तम

 

 

 

परिशिष्ट

छदम संगठनों से सावधान !

कृत्रिम सैनियों और उनके दुष्प्रचार से सावधान!

 

निम्न लिखित जातियां पंजाब के शूरसैनी अर्थात यदुवंशी क्षत्रिय सैनी भाईचारे से पूर्ण रूप से अलग हैं:

 राजसथान , मध्य प्रदेश और दक्षिण हरयाणा की माली जाति । इस  जाति के कुछ शठ तत्वों ने 1937 में प्रशासनिक छलबल से अपनी जाति का नाम सैनी लिखवा लिया जबकि इनका पंजाब के यदुवंशी सैनी क्षत्रिय भाईचारे के साथ कोई भौगौलिक , सांस्कृतिक और वंशानुगत सम्बन्ध नहीं है।  ऐसा अंग्रेजी काल में ब्रिटिश इंडिया की सेना के लिए योग्यता सिद्ध करने के लिए और "माली" शब्द से और उससे उत्पन होने वाली  हीन भावना से  अपनी पहचान को अलग करने के लिए किआ गया था।  स्मरण रहे कि अंग्रेजी काल में पंजाब के सैनी भाईचारे को स्टटूटोरी मार्शल कास्ट या वैधानिक योद्धा जातियों  की सूची में रखा गया था और पंजाब के जादोबंसी सैनी भाईचारे की भर्ती सेना में सीधे तौर पर  होती थी। इसलिए सैनी पहचान चुराने के स्पष्ट रूप से सामाजिक प्रतिष्ठा के इलावा  आर्थिंक और व्यावसायिक लाभ भी थे ।  । अट्ठारहां सौ इक्क्यानवे की मारवाड़ राज्य की जनसँख्या गणना रिपोर्ट में सैनी नाम की कोई जाति नहीं थी।  जिससे इस गोत्र चौर्य की  पोल अपने आप खुल जाति है। 1937 का जोधपुर स्टेट का आर्डर जिसके द्वारा  सैनी क्षत्रिय पहचान में घुसपैठ का कुत्सित प्रयास किया गया आसानी से उपलब्ध है। 

 1961  की जनसँख्या गणना रिपोर्ट में साफ़ इंगित है कि सैनी पहचान में घुसपैठ के प्रयास कैसे किये गए। इस तरह की घुसपैठ के प्रयास अंग्रेजी काल में अनेक क्षत्रिय जातियों के साथ हुए। केवल सैनी ही इस कुप्रयास के एक मात्र पीड़ित पक्ष नहीं रहे।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की तथा कथित "सूर्यवंशी सैनी” अर्थात् "गोला" जाति ।

 पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की तथा कथित "सूर्यवंशी सैनी" जाति का भी  पंजाब के यदुवंशी सैनी क्षत्रिय भाईचारे के साथ कोई सांस्कृतिक और वंशानुगत सम्बन्ध नहीं हैं ।  इस जाति का असली नाम "गोला" है। कई लोग इनको "भागीरथी माली"  भी कहते हैं।  इनकी पहचान के साथ "सैनी" कैसे जुड़ा यह एक अलग चर्चा का विषय है  क्यों कि ये स्वयम ही अपने को यदुवंशिओं से भिन्न मानते हैं और न ही पंजाब के जादो बंसी या यदुवंशी क्षत्रिए इनको अपने में से एक मानते हैं। वास्तव में यह काछी, माली, बागबान , गोला , भागीरथी , कोइरी इत्यादि सात या आठ अलग जातियों का समूह है जो वोटों की राजनीति के चलने के कारण "सूर्यवंशी सैनी" नामक समीकरण में परवर्तित हो गया। इनमे "सैनी" नाम की भी एक खाप थी जिसका पंजाब के यदुवंशी सैनियों अर्थात शूरसैनियों के साथ कोई सांस्कृतिक और वंशानुगत सम्बन्ध नहीं था । सन्दर्भ के लिए "सैनी" नाम की खापें जाटों , खैबर के पठानों,  मुग़लों और मुस्लमान राजपूतों या रंघड़ों, अखनूर के ब्राह्मणों, बनियों और कई और जातियों में भी थीं जिस से अपने आप में कुछ सिद्ध नहीं होता।   इस विषय में आगे कुछ और भी कहेंगे। 

 अंग्रेजी काल में भी इनकी भर्ती फ़ौज में नहीं होती थी।  केवल पंजाब के यदुवंशी क्षत्रिय सैनियों की ही सेना में भर्ती होती थी।  दोनों विश्वयुद्धों,  आज़ाद हिन्द फ़ौज में और स्वतन्त्र भारत के सभी युद्धों में   लड़ने वाले और अपने शौर्य से इंडियन आर्डर ऑफ़ मेरिट (महावीर चक्र) , परम वीर चक्र, विक्टोरिया क्रॉस के समकक्ष क्रॉस ऑफ़ सैन्ट जॉर्ज, और आर्डर ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया (सरदार बहादुर) जैसे सम्मान जीतने वाले सभी सैनी वीर योद्धा पंजाब से हैं।  एक भी पंजाब या उस के सीमावर्ती पशियमोत्तर हरयाणा या जम्मू से बाहर का नहीं है। 

और ना  ही उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के इस तथा कथित "सूर्यवंशी सैनी" नामक समीकरण अर्थात् गोला इत्यादि जातियों को अंग्रेजी काल में पंजाब के जादो बंसी सैनियों के जैसे अलग अलग क्षेत्रों की ज़ैलदारियाँ और सरदारियाँ  प्राप्त थीं ।  जैलदार पुराने समय के राजपुताना के ठाकुरों के समक्ष होते थे जो लगभग  बीस या उससे अधिक गाँवों की ज़ैल की कर वसूली करते थे और उनका प्रशासन देखते थे।  ये पदवी  सम्बंधित क्षेत्र की सबसे प्रतिष्ठित और वर्चस्वी जाति के चौधरिओं को ही दी जा सकती थी जिनकी जाति को सम्बंधित क्षेत्र की अन्य जातिओं के लोग भी प्रतिष्ठित और अग्रणीय माना करते थे।  स्थानीय जातीय पदानुक्रम में पीछे या नीचे रह जाने वाली किसी जाति को यह पद नहीं मिल सकता था क्योंकि उस काल में तथा कथित छोटी जाति वाला कोई व्यक्ति ऊँची जाति वाले लोगों से कर नहीं वसूल सकता था।  गलत या सही , समाज का ढांचा ही ऐसा था।  ।

पंजाब के जादो बंसी सैनियों की सामाजिक स्तिथि के ऊपर एक और परिपेक्ष के लिए यहाँ बताना अनुचित न होगा कि गुरदासपुर  में तलवंडी के सैनी सरदार  दल सिंह महाराजा रंजीत सिंह के प्रमुख सेना पतिओं में से थे और इन्होने अठारह सौ पैंतालीस में हुई एंग्लो सिख युद्ध में वीरगति प्राप्त की और इनकी जागीर इसी उपरान्त ही इनके वंशजों से छिनी। गुरदासपुर के सलारिया चौधरिओं के वैवाहिक सम्बन्ध  स्वयम सरकार--खालसा महाराजा रंजीत सिंह के साथ थे।  फुलकियां  रियासत के जरनैल नानू सिंह सैनी के परिवार  के पाब्ला सरदारों के पास 26000 बीघा (यानी 655 मुरब्बे) से भी कहीं अधिक ज़मीन थी और फुलकियां  के राज दरबार में इन जादो बंसी सैनी सरदारों को विशेष सम्मान और शाही  उपाधियाँ प्राप्त थीं। इसी परिवार के सरदार जय सिंह सैनी महाराजा रंजीत सिंह के लाहौर दरबार में भी विशिष्ट अतिथि होते थे।  पटिआला के पास जय नगर इन्ही की जागीर का अंश मात्र था ।

पंजाब के सैनी यदुवंशिओं के उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के इस तथा कथित "सूर्यवंशी सैनी" नामक समीकरण अर्थात् गोला इत्यादि जातियों में विवाह नहीं होते - और जैसे की स्वयम विदित है - ना ही इनके सामाजिक स्तर, संस्कृति, और सभ्याचार एक जैसे हैं । इनकी खापें या गोत भी  पंजाब के यदुवंशी क्षत्रिय सैनियों से पूर्ण रूप से भिन्न हैं। इनमे से एक खाप के नाम  की समानता मात्र संयोग वश है।  भारत भर में ऐसी कई जातियां हैं जिनके नाम में "सैनी" आता है पर वो आपस में एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं।

उदाहरण के रूप में बारह-सैनी नामक जाति पर दृष्टि डालिये।  हालांकि बारह-सैनी भी अपने को यदुवंशी मानते हैं परन्तु ये बिलकुल अलग जाति है जो बनियों में गिनी जाति है।  यह जाति आजकल अपने को  "वार्ष्णेय" कहलाती है पर अंग्रेजी काल तक इस जाति का शुद्ध ऐतिहासिक नाम बारह-सैनी ही था और इनकी संस्कृति बिलकुल कुलीन और उन्नत वणिक जातियों जैसी है (क्षत्रिय जातियों जैसी नहीं) ।

ठीक इसी प्रकार अग्गरवाल बनियों में भी बारह सैनी , चाऊ सैनी , और राजा सैनी नामक शाखाएं हैं जिनके वंशज अपने को  द्वापर युग के सूर्यवंशी राजा अग्गरसेन जी से  जोड़ते हैं। ये अग्रसेन जी यदुवंश की अंधक शाखा के राजा और श्री कृष्ण के नाना जी उग्रसेन से भिन्न बताये जाते हैं।  

इसी प्रकार संगीत के घरानो की शाखाओं में भी सैनी घराना है जो कि संगीत सम्राट तानसेन से जुड़ा हुआ है न कि यदुवंशी शूरसैनियों से या अग्गरवाल बनिया सैनियों  से। 

राजस्थान के खत्री छीपा या छीम्बा हैं , बिहार के खत्री सुनार हैं और गुजरात के खत्री दर्ज़ी हैं। क्या इसका यह अभिप्राय है कि पंजाब के खत्री भी छीम्बा, सुनार या दर्ज़ी हैं? माली तो 1930 के दशक के प्रशासनिक मिथ्या निरूपण से पहले स्वयम ही अपने को सैनी नहीं बोलते थे। 

ये कैसा बौद्धिक व्यभिचार है?

भारत का समाज शास्त्र ऐसी उदाहरणों से भरा पड़ा है। नाम की समानता विभिन्न कारणों से हो सकती है जिससे जाति की समानता स्वतः सिद्ध नहीं होती।

इस लिए पंजाब के जादो बंसी सैनी क्षत्रिय भाईचारे को उनकी घोर आपत्ति के उपरान्त भी उपरोक्त जातीय समूहों से जोड़ना अनीति ,  मिथ्याचार  और दुर्भावना की परिकाष्ठा होगी जो कि अशोभनीय और असहनीय है!


न्यायिक अस्वीकरण :


हम सभी जातियों का आदर करते हैं और सामाजिक  ऊंच नीच को प्रोत्साहन या समर्थन नहीं देते। हम किसी हिन्दू जाति के प्रति  द्वेष, ईर्ष्या  और श्रेष्ठता के भावना नहीं रखते । किन्तु किसी भी पक्ष द्वारा अपने कुल और जठेरों की वंशानुगत सांस्कृतिक  धरोहर की रक्षा के  कार्य के सन्दर्भ में जातिवाद का दोषारोपण  करना सर्वथा आधारहीन और अनुचित होगा ।

इस सन्दर्भ में  राष्ट्रीय कवि मैथिलि शरण गुप्त की यह  प्रसिद्ध काल जयी पंक्तिओं को उद्धृत करना असंगत न होगा :

जिसको न अपने बंधुओं के दुख सुख का ज्ञान है।

जिसको न अपने पूर्वजों की कीर्ति का कुछ ज्ञान है।

जिसकी न अपनी हीनता पर शोक , खेद महान  है ।

जिसको नहीं खलता कभी संसार में अपमान है।

जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है।

वह नर नहीं , पशु निरा है, और मृतक समान है ।

मैथिलि शरण गुप्त जिस "पूर्वजों की कीर्ति के ज्ञान " की यहाँ बात कर रहें हैं , हमारा उत्साह भी उसी "पूर्वजों की कीर्ति के ज्ञान" के छदम  वृतांतों में विलय और लुप्त हो जाने की प्रक्रिया का निरोध करने तक ही सीमित है (किसी जाति विशेष का अपमान करने के लिए नहीं) ।  यह चेतना  शास्त्रों में बताये हुए पितृ ऋण  के सिद्धांत से भी सम्बंधित है जिस से जादो बंसी सैनी क्षत्रियों की चिर काल से चलती  आ रही जठेरा पूजन की  वैदिक परम्परा मौलिक रूप से जुडी हुई है ।"पूर्वजों की कीर्ति का  ज्ञान "  किसी भी दृष्टि से जातिवाद नहीं है और न ही हम इसके लिए किसी भी सांस्कृतिक मार्क्सवादी चिंतक  से क्षमा याचना के अभिलाषी हैं ।

 इस लेख में दूसरे  जाति समुदायों का विवरण केवल पंजाब के  सैनी जादोबंसी   क्षत्रिय या शूरसैनी भाईचारे की   अनमोल और विशिष्ट पहचान  और उनके ऐतिहासिक वृत्तांत को असामाजिक तत्वों -और वोटों के लालची धूर्त  नेताओं के दुष्प्रचार से सुरक्षित रखने के लिए दिया गया है। 

हर जातीय समूह अपना सामाजिक उत्थान चाहता है।  इसमे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए और हम इसका अंतर्मन से समर्थन और सहयोग करते हैं।  परन्तु किसी भी जाति को यह अधिकार नहीं है कि वो अपने उत्थान के लिए किसी दूसरी जाति की पहचान और इतिहास से छेड़ छाड़ करे। 

हम अब विवश हो कर प्रति क्रिया केवल इस लिए दे रहे हैं कि कई दशकों से शुद्ध जादो  बंसी  सैनियों की तथ्य पर आधारित  प्रति क्रिया के अभाव के कारण ये दुष्प्रचार दिन प्रति दिन  बढ़ता ही जा रहा है । शुद्ध यदुवंशी क्षत्रिय रक्त वाले पंजाब के सैनियों को इस सांस्कृतिक प्रदूषण के दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं।  अगर किसी दूसरे सामाजिक समूह के कुछ लोग आकर  आपके शताब्दियों  से चलते आ रहे  बाप दादाओं के नाम , पहचान और जीवन वृत्तांत जड़ से ही बदलने का कुप्रयास करें तो उनके उत्तराधिकारियों की धर्म संगत, न्यायोचित , और रौद्र प्रति क्रिया के लिए वह स्वयम उत्तरदायी हैं।

1964 में पंजाब के महान शिक्षकों  में गिने जाने वाले और खालसा कॉलेज (अमृतसर) में अंग्रेजी साहित्य के  प्रोफेसर डॉक्टर करतार सिंह (पी एच डी, पंजाब यूनिवर्सिटी) ने भी अपने बहुचर्चित  निबंध में ,  पंजाब के शुद्ध रक्त यदुवंशी सैनी क्षत्रियों का प्रतिनिधित्व करते हुए,  इस आक्रोश को प्रकट किया था। उस से पहले अंग्रेजी काल में  भी पंजाब के सैनी भाईचारे के वयोवृद्ध लोग इस के विरुद्ध आपत्ति प्रकट करते रहे।  इस छदम सामाजिक अभियांत्रिकी या सोशल इंजीनियरिंग से केवल वोट बैंक  और पद के लोभी राजनैतिक छुटभैय्ये और टट्ट पूंजिये ही लाभान्वित होते हैं।  भाईचारे के शेष सदस्यों में इससे केवल  मनोबल और उत्साह  की हानि  होती है जिस से कालांतर में शुद्ध कृष्णवंशी शूरसैनी यादव राजाओं  के रक्त  वाले पंजाब के सैनी भाईचारे का पूर्ण विनाश निश्चित है । सैनी भाईचारे के विचारशील युवक और वृद्ध दोनों सैनी कुल दीपक, स्वर्गीय सरदार करतार सिंह (पी एच डी), द्वारा व्यक्त की गई आपत्ति और इस चेतावनी को अतयंत गंभीरता से लें। 

पंजाब में सिख पंथ और आर्य समाज के प्रभाव के कारण भी सैनी भाईचारे के जनसाधारण लोग अपनी जातीय पहचान के लिए इतने सजग नहीं हैं।  जिसके फल सवरूप   जातीय इतिहास के प्रति उनकी तुलनात्मक अरुचि का शोषण पंजाब के बाहर के छदम सैनी संगठनो ने  और अनैतिक राजनीतिकारों ने  भरपूर किया है।   

एक हज़ार साल तक मुसलमान हकूमत से युद्ध करके और हर तरह का अत्याचार सह कर सैनी पहचान क्या इस दिन के लिए बचाई गयी थी कि दो कौड़ी के स्वार्थी वोट बैंक के भूखे टट्ट पुँजिये नेता  उसे खैरात की तरह अन्य जातियों में बाँट दें जो रक्त, सामाजिक स्तर और संस्कृति तीनो से सैनियों से बिलकुल अलग हैं?  और जो अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए सैनियों की चिर काल से चलती आ रहे इतिहास और पहचान को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ते और मरोड़ते हैं ?

अगर ये लोग जातिवाद के विरुद्ध सच में लड़ रहे होते तो पंजाब में बहुत और स्थानीय जातियां हैं जो तथा कथित ऊंची जातियों के व्यवहार से तंग आकर ईसाई मत कि तरफ भाग रही हैं। । पहले इन जातियों को गले लगाएं जो मलेछ धर्म परिवर्तन गिरोहों द्वारा भ्रमित और शोषित हो रही हैं। उत्तरप्रदेश और राजस्थान के गोले और मालिओं की समाज सेवा का स्वांग अपनी खोटी राजनीति को सिद्ध करने के लिए उसके बाद में रचें ।

 "वसुधा एव कुटुम्भकम"  और "मानस की जात सभै  एको पहचानबो"  की वैदिक और सिख परिदृष्टि से भी अगर सोचा जाये तो भी पंजाब की स्थानीय सर्व समाज की जातियां जैसे छिम्बा, सुनियारा, खत्री, अरोड़ा, ब्राह्मण,  तरखान, जट्ट,जुलाहा, झीर, मज़हबी सिख इत्यादि  सैनियों के यू पी और राजस्थान की  जातियों से अधिक निकट हैं क्यों कि हम कम से कम एक हज़ार वर्ष से इनके साथ रह रहे हैं और इनके दुख और सुख बांटते आ रहे है।  । पहले अपने  पड़ोस वाली पंजाबी जातियों को  अपना  भाई बनायें और फिर दूसरे प्रदेशों के लोगों के कल्याण की चिंता करें जो कि अपने हित साधने के लिए पूर्ण रूप से सक्षम हैं। दान , पुण्य , और समाजसेवा का कार्य सदा घर से प्रारम्भ होता है।  छदम समाज सेवा का आडम्बर न करें।   

और ना ही वैदिक और पौराणिक साहित्य में , भाई गुरदास जी की वारों में, आदि श्री ग्रन्थ साहिब जी में, और अन्य सिख साहित्यिक कृतियों में अति सम्मानित और पूजित अवतारों और महापुरुषों का घोर अपमान करने वाले, अंग्रेज़ों के पाले हुए टट्टू, जोति राओ फुले, को चालाकी से सैनी बता कर (जो वो नहीं था), उसका हर स्थान पर चित्र लगाकर, पूरे सैनी भाईचारे का आध्यात्मिक नाश करें।  ऐसे गुरमत विरोधी, सनातन और सिख पंथ के विनाश करने वाले काम और दुष्प्रचार ये सत्ता के लोभी टटपूंजिये नेता छोड़ दें और पंजाब से बाहर निकल जाएँ । ये उनको चेतावनी है। 

अंतिम शब्द

पंजाब का जादोबंसी सैनी  भाईचारा नैतिकता विहीन राजनीति से प्रेरित  इन   छदम सैनी संगठनों के दुष्प्रचार को अब और स्वीकार नहीं करेगा। अगर अपने पूर्वजों की ख्याति का ज्ञान उपार्जन और रक्षा  जातिवाद होता तो दसवीं पातशाही गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज रामावतार और कृष्णावतार जैसी कृतियां लिखवाकर उन्हे दशम दरबार में क्यों संकलित करवाते और अपने खालसे को उसे क्यों पढ़ाते ? सैनियों के पास कृष्णावतार की रक्त धारा और संस्कृति दोनों नैसर्गिक रूप से हैं ।  वह उसका परित्याग क्यों करें?  

अपने वीर, सदाचारी, बलिदानी, और त्यागी जठेरों की ख्याति और उनके धार्मिक मूल्य ही क्षत्रिय कुलों की सब से बहुमूल्य सम्पति होती हैं । इनके बिना क्षत्रिय रक्त निस्तेज  और निर्वीर्य हो जाता है । जिससे सर्व समाज में  आदर्शहीनता , पाप, और  अनाचार बढ़ता है (केवल उस क्षत्रिय जाति में ही नहीं) । बलभद्र की सौगंध हम  इन्हे  मिटने या इनमे किसी को  प्रक्षेप नहीं करने देंगे।    

सुनने के लिए धन्यवाद!

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