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सैनी योद्धा और अमर बलिदानी राजा शेर सिंह सलारिया

Saini Warrior Raja Sher Singh Salaria

जय दाते दी ! 

ये घटना मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के समय की है ! उस समय भारत छोटे छोटे राजाओ में बंटा हुआ था ! हरीपुर एक छोटा सा राज्य स्यालकोट  (पाकिस्तान) तथा जम्मू क्षेत्र  में स्तिथ था ! जिसका अब नाम सोहागपुर  है ! हरिपुर राज्य  में राजा सोहाग सिंह सैनी सलारिया का शासन  था ! राजा सोहाग सिंह सैनी सलारिया की पत्नी का नाम सुंदरवती था । हरिपुर राज्ये की सभी जनता हिन्दू धर्म से थी !   किन्ही कारणवश राजा  सोहाग सिंह सैनी सलारिया   की अकाल मृत्यु  हो गयी ! उस समय राजा सोहाग सिंह सैनी सलारिया का एक  ही पुत्र था ,  श्री शेर सिह सैनी सलारिया  ! अपने पिता के निधन के समय शेर सिंह सैनी सलारिया किशोर अवस्था में थे  ! अंत माता सुंदरवती जी ने ही अपने पति महाराजा सोहाग सिंह सैनी सलारिया के  निधन के उपरांत हरिपुर राज्य की गद्दी संभाली ! परंतु 2-3  वर्ष उपरांत जब उनके पुत्र श्री शेर सिंह सैनी सलारिया जब युवा हो गए तो राज्य  का पूरा भार उनको ही सौप  दिया गया ! उस समय मुग़ल सम्राट हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन करा रहा था ! कश्मीर के हिन्दू धर्म परिवर्तन कर चुके थे और जम्मू में भी  कुछ हिन्दू धर्म परिवर्तन करके मुस्लमान बन चुके थे ! औरंगज़ेब के समय में चक माजरा,चक किम ,पसगाल , मुरछापुर , वडीपुर ,शेखोपुर , अदलैर , फतेहगढ़ , किर्च्पुर खवासपुर  आदि गांव के हिन्दू मुसलमान धर्म सवीकार कर गए थे ! यह सभी गांव वर्तनमान में तहसील बिश्नाह (जम्मू ) में स्तिथ है और यहाँ के मुसलमान 1947 में भारत छोड़  कर  पाकिस्तान चले गए है  ! माता सुंदरवती ने हरिपुर राज्य का  नाम अपने स्वर्गवासी पति महाराज सोहाग सिंह सैनी सलारिया  के नाम पर सोहागपुर रख दिया था और यह गांव अब अरनिया सेक्टर में पड़ता है ! यह पूरा  गाँव सैनियों का है जो की शेर सिंह सैनी सलारिया के वंशज है ।

 कहते है की एक  दिन मुग़ल गाय चुरा के ले जा रहे थे   और एक बिलखते हुए ब्राह्मण के माध्यम से इस बात की सूचना  राजा शेर सिंह सैनी सलारिया  को मिली। तब राजा शेर सिंह सैनी सलारिया अपनी माता के आशीर्वाद लेके घोड़े पर सवार होकर  गो माता को मुक्त करवाने निकल पड़े । बजुर्ग कहते है की गोरा चक नमक एक  स्थान पर मुगलों  और राजा शेर सिंह सैनी सलारिया  के बीच भयंकर मुठभेड़  हुई  ! राजा शेर सिंह अपनी बहादुरी और दलेरी से उस युद्ध में विजयी  रहे और गो माता को आदर सम्मान  के साथ वापिस लेकर  आ रहे थे। उस समय एक  घायल मुसलमान ने धोखे से उनपर पीछे से वार किया और राजा शेर सिंह का मस्तक कट के  रणभूमि में गिर गया । सोहागपुर में जहाँ इस शूरवीर सैनी  राजपूत का अंतिम संस्कार हुआ  वहां  वर्तमान में राजा शेर सिंह सैनी  सलारिया की समाधी है ! यहाँ प्रति मास  पूर्णमासी को एक  विशाल भंडारा होता है और आज के समय में यह स्थान एक ऐतिहासक और बलिदान स्थान के नाम से जाना जाता है !   जम्मू , पठानकोट, कठुआ और   गुरदासपुर के सभी सलारिया क्षत्रिय/राजपूत  शेर सिंह सैनी सलारिया को अपना जठेरा मानते हैं और इस वीर पुरुष की समाधी पर जा कर नतमस्तक होते हैं । यह जम्मू के सैनियों  (विशेष रूप से सलारिया कुल के सैनियों ) के लिए एक तीर्थ स्थान है । भारत के बटवारे से पहले  स्यालकोट के  सलारिया  भी तीर्थांटन के लिए सोहागपुर आया करते थे ।  इस देव भूमि पर "जय दाते दी" का पवित्र उद्घोष सुना जा सकता है । 

वर्तमान में जम्मू और कश्मीर पुलिस से रिटायर्ड इंस्पेक्टर जनरल (IG)  श्री कमल सिंह सैनी (IPS) इस पवित्र देव स्थल के मुख्य प्रबंधक हैं ।

पश्चिम पंजाब और  सीमान्त क्षेत्र के सैनी राजपूत , मुग़ल सैनी , खाटक पठान सैनी

स्यालकोट में सैनियों को  डोगरा सैनी भी कहा जाता था । 1901 की जनगणना में "सैनीवाल" और "मुग़ल सैनी" नाम के मुस्लमान राजपूत भी दर्ज हैं । इनके गोत (सलारिया , धमडीएल , बड़ला, बडवाल, इत्यादि) हिन्दू  और सिख सैनियों वाले ही हैं । अंग्रेजी प्रशासक, डेन्ज़िल न , जिसने सैनी और मेहता  राजपूतों के बारे में भ्रांतियां भी फैलायीं थी , यह स्वीकारता है की यह मुस्लमान राजपूत सैनियों में से धर्म परिवर्तन करके अपने को "मुग़ल सैनी" कहलाने लगे ।  मुस्लमान कियानी और गखड़ राजपूत भी धर्म परिवर्तन के बाद अपने को "मुग़ल" कहलाने लगे और उनके इन मुस्लमान सैनीवाल राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्ध थे  ।इसी प्रकार अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर 'खाटक सैनी'' नाम वाले   के पठान पाए जाते हैं | सिआलकोट , रावलपिंडी और पाकिस्तान के सीमान्त क्षेत्र पूर्व मधयकालीन सैनी यदुवंशियों के ठिकाने  थे | यह खाटक पठान सैनी और मुग़ल सैनी हिन्दू सैनी राजपूतों के ही वंशज हैं | इन लोगों के पूर्वजों ने डट कर इस्लामी आक्रांताओं का मुकाबला कई सदियों तक किया किन्तु कालचक्र के फेर से बाद में पराजय हुई और भारी संख्या में यह मुसलमान हो गए | जो हिन्दू रह गए वह कृषि जैसे व्यवसायों से अपना जीवन यापन करने लगे| मुसलमानो द्वारा  हिन्दू राजपूतों पर लादी गयी "डोला" संस्कृति के कारण अपनी बहु बेटियों की इज़्ज़त और कुल धर्म को बचाने के लिए कईओं ने अपनी राजपूत पहचान भी गुप्त कर ली | भाटी जो की सैनी राजपूतों की एक शाखा है  पाकिस्तान के पंजाब का सबसे बड़ा मुसलमान राजपूत कबीला है और इनके गोत भी सैनियों से बहुत मेल खाते हैं  | 

 सलारिया क्षत्रिय

 सलारिया क्षत्रिय  दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल के सपुत्र कुंवर सलेरिया पाल के वंशज हैं । यह सैनियों की सबसे बड़ी शाखा है और इनके जम्मू और गुरदासपुर ज़िलों में लगभग 15-20 गाँव हैं । स्मरण रहे तोमर राजवंश को कर्नल टॉड और कन्निंघम जैसे इतिहासकारों ने यदुवंशी माना है । दिल्ली और इंद्रप्रस्थ जहाँ तोमरों का शासन था शूरसेन गणराज्य के मध्य में था । इसलिए इन तोमरों का सैनी कहलाये जाना  स्वाभाविक  था  । पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के उपरान्त युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण के पड़पौत्र वज्रनाभ को इंद्रप्रस्थ का राजा बनाया था और सात्यकि के पौत्र युगांधर  को सरस्वती नदी के पूर्व का राजा बनाया जो की आज कल का हरयाणा प्रांत है (देखिये पार्गिटर) । यह दोनों राजा यादव थे और शूरसैनी कहलाते थे ।




सन्दर्भ/References

  • A Dictionary of the Pathan Tribes on the North-west Frontier of India, pp 134,  pp 184,  Office of the Superintendent, Government Print, India, 1899 / Editorial Note: This dictionary mentions "Manak Khel " as a Pathan sept on pp 134.  "Manak" or "Manik" is confirmed to be an authentic  Yaduvanshi Saini/Bhati clan. Manak Sainis found in Hoshiarpur, Jalandhar and Ludhiana. Their main village is "Manak Dheri" where their Jatheras are located. In Pakistan , Manak is a sub clan of Wattu which  is just a distortion of  Bhati (Bhattu->Wattu). On pp 184, more information is given on Pathan septs directly named after  their Saini forbearers. These are "Saini Khel", "Sain Khel" and "Sainzai".  Similarly ,  on pp 136, "Mangi Khel", "Mangalai" and "Mangals", corresponding with Saini/Dogra clan name  "Mangar"  or "Mangral" ,  appear to be Saini/Bhati offshoot too from Raja Mangal Rao, a regent of Saini/Bhati lineage.  Although like many other Pakistanis, the Pathans like to claim origin from outside of South Asia, their  predominant "L"  based Y-DNA genetic lineages confirm that they are an Indic stock falling in same genetic cluster as other North Indians and Pakistanis. These correspondences of clan names do not appear to be random and there is already  a well ensconced academic  theory given by Colonel James Tod as back as in early 19th century which  indicates that many Pathan clan names (Jadoon, for instance) and customs are remnants of pre-medieval Yaduvanshi rulers of Afghanistan and Punjab. The Hindushahi/Kabulshahi  dynasty which was first to fight Mahmud of Ghazni also appears to have been  a Yaduvanshi stock .
  • Records of the Commissioners of the Port of Chittagong: 1937-1947, Misbahuddin Khan, Chittagong Port Authority, 2002 
  • History of Saini Caste, Professor Kartar Singh, Khalsa College , Amritsar, 1964
  • Ancient Indian Historical Tradition,Pargiter, F. E. . London: Oxford University Press, 1922
  • The People of India, Risley , Crooke et al , Asian Education Services , 1999/ Editorial Note: On pp 416 write the authors: "The ease with which Saiyads are manufactured is proverbial, and some of the highest Rajput tribes are now beginning to claim Moghal or Arab origin."
  • Census of India, 1901, Volume 17, pp 354,By India. Census Commissioner 

  • Panjab castes; being a reprint of the chapter on "The races, castes and tribes of the people" in the report on the census of the Panjab published in 1883 by the late Sir Denzil Ibbetson, pp 212, Ibbetson, Denzil, Sir, 1847-1908